Now Loading

रोहिणी व्रत

20 नवम्बर, 2021 (शनिवार) जैन समुदाय का सबसे खास व्रत रोहिणी व्रत होता है। आज के दिन जैन समुदाय के लोग रोहिणी व्रत करते हैं।  इस व्रत का महत्व जैन समुदाय के लिए अत्याधिक माना गया है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के दिन किया जाता है। यही कारण है कि इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। व्रत के पारण की बात करें तो यह तब किया जाता है जब रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होता है और मार्गशीर्ष नक्षत्र आता है। हर वर्ष 12 रोहिणी व्रत आते हैं। मान्यता है कि इस व्रत का पालन 3, 5 या 7 वर्षों तक लगातार किया जाता है। अगर उचित अवधि की बात करें तो यह 5 वर्ष और 5 महीने है। इस व्रत का समापन उद्यापन द्वारा ही किया जाता है। यह व्रत पुरुष और स्त्रियां दोनों कर सकते हैं। हालांकि, स्त्रियों के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है।  रोहिणी व्रत महत्व जैन समुदाय की मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का विशेष फल प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से आत्मा के विकार दूर होते हैं। रोहिणी व्रत कर्म बंधन से छुटकारा दिलाने में सहायक होता है। रोहिणी व्रत पूजा विधि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाना चाहिए और घर की साफ सफाई भी अच्छे से कर लेनी चाहिए। इसके बाद सभी नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर घर की साफ-सफाई करनी चाहिए। गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान करें और फिर व्रत का संकल्प लें। फिर आमचन कर अपने आप को शुद्ध करें। इसके बाद सबसे पहले सूर्य भगवान को जल का अर्घ्य दें। इस व्रत के दौरान जैन धर्म में रात का भोजन करने की मनाही होती है। ऐसे में इस व्रत को अगर आप कर रहे हैं तो आपको फलाहार सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए। रोहिणी व्रत की पौराणिक कथा प्राचीन समय में चंपापुरी नगर में राजा माधवा और रानी लक्ष्‍मीपति रहते थे। उनके उनके 7 पुत्र और एक पुत्री रोहिणी थी। जब राहणी बड़ी हुई तो राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने बताया कि आपकी पुत्री का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया, जिसमें राजकुमार अशोक भी आए और रोहणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और दोनों का विवाह हो गया।  एक दिन हस्तिनापुर में चारण मुनिराज पधारे थे तब राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गए और उनके धर्म उपदेश सुने। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा हुआ करता था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की एक कन्या हुई जिसके शरीर से हमेशा ही दुर्गंध आती रहती थी और यह सोच कर वह चिंतित होता था कि उसकी कन्या से कौन विवाह करेगा। धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध के कारण वह दुर्गंधा को छोड़ कर चला गया। उसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को पता चला कि उनकी रानी के कारण ऐसा हुआ है तो उन्होंने अपनी रानी को नगर से निकाल दिया और रानी को किए पाप के कारण शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। तब धनमित्र ने पूछा स्वामी मुझे इससे मुक्ति का उपाय बताएं। तब स्वामी ने कहा कि यदि परिवार के सभी सदस्य रोहिणी व्रत पालन करें तो इससे मुक्ति मिल सकती है। यह व्रत पांच साल और पांच मास लगातार हर महीने करना होगा। इसके बाद सभी ने ऐसा ही किया और दुर्गंधा के शरीर से बदबू आना बंद हो गई। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई।